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नई दिल्ली। नई दिल्ली में राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष का प्रदर्शन मंगलवार को करीब नौ घंटे के धरने और हिरासत के साथ खत्म हुआ। संसद से निर्वाचन आयोग की ओर बढ़ रहे विपक्षी सांसदों को पुलिस ने रोका। इसके बाद राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और दूसरे विपक्षी नेताओं ने आकाशवाणी भवन परिसर में धरना दिया। शाम को पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। प्रदर्शन की तस्वीरें और राहुल गांधी का पुलिस बैरिकेड पर चढ़कर तिरंगा लहराना पूरे दिन राजनीतिक चर्चा का केंद्र रहा।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का महत्व केवल इतनी बात में नहीं है कि राहुल गांधी को हिरासत में लिया गया। इसके पीछे असली मुद्दा विशेष गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण यानी SIR और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्ष के सवाल हैं। राहुल गांधी और विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं कि मतदाता सूची में हेरफेर के जरिए लोगों के मतदान के अधिकार को प्रभावित किया जा रहा है। इन आरोपों को विपक्ष का दावा मानना जरूरी है; निर्वाचन आयोग ने इन पर अलग रुख रखा है।
इस विवाद में एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी के बाद Form 6 को लेकर राजनीतिक टकराव और तेज हुआ है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि उसने Form 6 के किसी संशोधित स्वरूप को मंजूरी नहीं दी थी और मामले में रिकॉर्ड की जांच की दिशा में आगे बढ़ने की बात कही है। विपक्ष ने इसे अपने आरोपों के समर्थन के रूप में लिया, जबकि भाजपा ने कहा कि अदालत ने Form 6 को अवैध नहीं ठहराया है। निर्वाचन आयोग का कहना है कि SIR से जुड़े फैसले निर्धारित प्रक्रिया के तहत लिए गए हैं और आयोग में किसी तरह के मतभेद की बात भी उसने खारिज की है।
यहीं से राहुल गांधी के आंदोलन का पहला राजनीतिक लाभ दिखाई देता है। कांग्रेस ने ऐसा मुद्दा चुना है जिसे वह केवल अपनी पार्टी का मुद्दा न रखकर लोकतंत्र और वोट के अधिकार का सवाल बनाने की कोशिश कर रही है। अगर मतदाता को यह भरोसा हो जाता है कि मतदाता सूची में उसका नाम सुरक्षित रहना भी राजनीतिक लड़ाई का विषय है, तो यह मुद्दा कांग्रेस के लिए चुनावी नुकसान की शिकायत से आगे बढ़कर लोकतांत्रिक अधिकार का सवाल बन सकता है।
दूसरा फायदा विपक्षी एकजुटता का है। दिल्ली के प्रदर्शन में कांग्रेस के साथ समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों के नेता भी दिखाई दिए। यहां तक कि बीजू जनता दल, जो खुद को न INDIA ब्लॉक में मानता है और न NDA में, उसके सांसद भी मार्च में शामिल हुए। यह अपने आप में संकेत है कि निर्वाचन प्रक्रिया और SIR का मुद्दा अलग-अलग विपक्षी दलों को एक साझा मंच पर ला रहा है।
लेकिन यही वह जगह है जहां कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी कमजोरी भी खड़ी होती है। विपक्ष यदि लगातार यह कहता रहा कि चुनाव प्रक्रिया ही अविश्वसनीय है, तो अगला सवाल स्वाभाविक है: फिर वह उसी चुनावी व्यवस्था में सत्ता हासिल करने की लड़ाई क्यों लड़ रहा है? यह सवाल भाजपा पहले ही उठा रही है। इसलिए कांग्रेस को आरोपों से आगे बढ़कर ठोस, जांचे-परखे और सार्वजनिक रूप से समझाए जा सकने वाले प्रमाण लगातार सामने रखने होंगे। केवल धरना, नारे और गिरफ्तारी की तस्वीरें लंबे समय तक राजनीतिक मुद्दा नहीं बनातीं।
राहुल गांधी के लिए यह आंदोलन व्यक्तिगत नेतृत्व की परीक्षा भी है। मंगलवार को पूरे घटनाक्रम में विपक्ष के सामूहिक प्रदर्शन के बावजूद सबसे ज्यादा दृश्यता राहुल गांधी को मिली। बैरिकेड पर चढ़ना, तिरंगा लहराना और फिर पुलिस द्वारा हिरासत में लिया जाना टीवी और सोशल मीडिया की बड़ी तस्वीरें बनीं। इससे राहुल की सड़क पर संघर्ष करने वाले विपक्षी नेता की छवि मजबूत हो सकती है। लेकिन यही रणनीति यदि बार-बार केवल दृश्य पैदा करने तक सीमित रही और उसके पीछे ठोस राजनीतिक संगठन नहीं बना, तो इसका असर सीमित भी हो सकता है।
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ‘वोट चोरी’ का नारा कितना व्यापक जनमुद्दा बनता है। राजनीतिक विश्लेषण में यह सवाल पहले से उठ रहा है कि यह अभियान अब तक व्यापक स्वत:स्फूर्त जनआंदोलन में क्यों नहीं बदला है और क्या यह मुद्दा पार्टी समर्थकों से बाहर आम मतदाता तक पहुंच पा रहा है। यही अंतर कांग्रेस की राजनीतिक सफलता और सिर्फ मीडिया सुर्खियों के बीच तय करेगा।
विपक्ष को इसका नुकसान कहां हो सकता है? पहला, यदि आरोपों के जवाब में पर्याप्त दस्तावेज और स्पष्ट प्रमाण नहीं आते तो जनता इसे चुनावी हार की जिम्मेदारी संस्थाओं पर डालने की कोशिश के रूप में देख सकती है। दूसरा, निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्था पर लगातार हमले की भाषा विपक्ष को उन मतदाताओं से दूर कर सकती है जो संस्थाओं की आलोचना तो चाहते हैं, लेकिन संस्थाओं पर अविश्वास की राजनीति नहीं। तीसरा, विपक्षी एकता अभी भी मुद्दा-आधारित है; अलग-अलग राज्यों में इन्हीं दलों के हित अलग हैं। दिल्ली की एक तस्वीर को स्थायी विपक्षी एकता मान लेना जल्दबाजी होगी।
भाजपा के लिए भी यह प्रदर्शन पूरी तरह आराम की स्थिति पैदा नहीं करता। यदि विपक्ष मतदाता सूची, SIR और चुनावी पारदर्शिता को लगातार राजनीतिक एजेंडा बनाए रखता है तो भाजपा और सरकार को बार-बार इन सवालों का जवाब देना पड़ेगा। निर्वाचन आयोग को भी अपनी प्रक्रियाओं और फैसलों की सार्वजनिक व्याख्या जितनी पारदर्शी रखनी होगी, उतना ही विवाद को राजनीतिक जमीन मिलने से रोका जा सकेगा। मंगलवार को आयोग ने कहा कि शाम 4 बजे तक किसी राजनीतिक दल ने औपचारिक मुलाकात का अनुरोध नहीं किया था और बाद में मिली 240 सांसदों की मुलाकात की मांग निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं थी।
अब आगे की लड़ाई सड़क पर कम और संगठन तथा प्रमाण के स्तर पर ज्यादा होगी। कांग्रेस और विपक्षी दल 7 अक्टूबर को भी विरोध कार्यक्रमों की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। बिहार में भी SIR के खिलाफ विपक्ष ने ब्लॉक स्तर तक ‘आक्रोश मार्च’ की घोषणा की है। इसका अर्थ है कि दिल्ली का धरना एक अलग घटना बनकर खत्म नहीं हुआ है; विपक्ष इसे लगातार चलने वाले राजनीतिक अभियान में बदलने की कोशिश कर रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे सटीक निष्कर्ष यही है कि राहुल गांधी ने मुद्दा जरूर बड़ा कर दिया है, लेकिन अभी उसे राजनीतिक लाभ में बदलना बाकी है। कांग्रेस को इससे तत्काल तीन फायदे मिले हैं: राहुल गांधी फिर राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आए, विपक्षी दल एक मंच पर दिखे और चुनावी पारदर्शिता का मुद्दा भाजपा के सामने जवाबदेही का सवाल बन गया। लेकिन कांग्रेस के सामने तीन बड़े सवाल भी खड़े हैं: क्या वह अपने आरोपों को निर्णायक प्रमाण में बदल पाएगी, क्या यह मुद्दा आम मतदाता को उसी तीव्रता से प्रभावित करेगा और क्या विपक्षी एकता चुनावी मैदान तक कायम रह पाएगी?
इसलिए मंगलवार का धरना कांग्रेस की जीत नहीं, बल्कि कांग्रेस की रणनीति का अगला चरण है। यदि ‘वोट चोरी’ का मुद्दा जनता के बीच ठोस भरोसे और प्रमाण के साथ पहुंचता है, तो इसका असर बड़ा हो सकता है। अगर यह केवल राजनीतिक नारों और टकराव तक सीमित रह गया, तो इसकी तस्वीरें तो याद रहेंगी, लेकिन चुनावी असर उतना बड़ा नहीं होगा। यही इस आंदोलन की असली परीक्षा है।
