रायपुर। कलिंगा विश्वविद्यालय के कला एवं मानविकी संकाय द्वारा 20 व 21 फरवरी 2026 को “सस्टेनेबल फ्यूचर: कल्चर, सोसायटी एंड गवर्नेंस इन ट्रांजिशन” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। समापन समारोह में विशेषज्ञों ने समावेशी विकास, सांस्कृतिक मूल्यों और पारदर्शी शासन को सतत भविष्य की आधारशिला बताया।
उद्घाटन सत्र में उच्च शिक्षा विभाग, छत्तीसगढ़ शासन के आयुक्त डॉ. संतोष कुमार देवांगन मुख्य अतिथि और जनसंपर्क विभाग के अपर संचालक डॉ. आलोक देव विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए। विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. संदीप अरोरा, कुलपति डॉ. आर. श्रीधर और कुलसचिव डॉ. संदीप गांधी ने संगोष्ठी का शुभारंभ करते हुए शोधपत्रों की संकलित पुस्तक का विमोचन किया।
विकास तभी सतत जब सबकी भागीदारी हो
डॉ. संतोष कुमार देवांगन ने कहा कि विकास को तभी सतत माना जा सकता है, जब वह पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समावेशन और जवाबदेह शासन पर आधारित हो। उन्होंने छत्तीसगढ़ की जनजातीय परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रकृति के साथ संतुलन ही स्थायी विकास का मूल मंत्र है। राज्य में शिक्षा, छात्रवृत्ति, महिला स्वास्थ्य, ग्रामीण एवं जनजातीय सशक्तिकरण की विभिन्न योजनाएं इसी दिशा में प्रयासरत हैं। ई-ऑफिस और डिजिटल प्रबंधन प्रणाली से सुशासन को मजबूती मिली है।
समावेशिता ही राष्ट्र की ताकत
डॉ. आलोक देव ने कहा कि सतत भविष्य मूल्य-आधारित नेतृत्व और सांस्कृतिक संतुलन का अवसर देता है। भारत की भाषाई, सांस्कृतिक और जनजातीय विविधता इसकी सबसे बड़ी पूंजी है। जनजातीय समाज से संतुलित जीवन, सामुदायिक निर्णय प्रणाली और संसाधनों के संयमित उपयोग की सीख मिलती है। उन्होंने सामाजिक न्याय, डिजिटल कनेक्टिविटी और तकनीकी सशक्तिकरण को समय की आवश्यकता बताया।
संसाधनों के अति-दोहन पर रोक जरूरी
समापन समारोह के मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ के सूचना आयुक्त डॉ. शिरीष चंद्र मिश्रा ने कहा कि समाज, संस्कृति और प्रशासन मिलकर ही संसाधनों के अति-दोहन को रोक सकते हैं। शिक्षा और सांस्कृतिक मूल्य अनावश्यक संचय से बचने की प्रेरणा देते हैं। उन्होंने कहा कि विकास ऐसा हो जो किसी को नुकसान न पहुंचाए।
साहित्य अकादमी के सदस्य प्रो. सियाराम शर्मा ने कहा कि भूमंडलीकरण के बाद अमीरी-गरीबी की खाई बढ़ी है। समावेशी विकास ही लोकतांत्रिक मूल्यों को सार्थक बना सकता है। बाजार व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि क्रय शक्ति के अभाव में व्यक्ति हाशिए पर चला जाता है, इसलिए संतुलित विकास आवश्यक है।
498 शोधपत्र, विदेश से भी सहभागिता
संगोष्ठी में देशभर के विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों ने भाग लिया। कुल 498 शोधपत्र प्रस्तुत करने के लिए पंजीकरण हुआ। दुबई और जर्मनी से भी ऑनलाइन शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। सात स्मार्ट कक्षों में ऑनलाइन और ऑफलाइन मोड पर तकनीकी सत्र आयोजित हुए।
बेस्ट रिसर्च पेपर अवॉर्ड पिंकी प्रधान, अभिजीत सरकार, धीति शर्मा, नीलू फरत और शमिता सिंह को प्रदान किया गया। कार्यक्रम का संचालन असिस्टेंट प्रोफेसर सुमीरा मदान और सोनाली किसपोट्टा ने किया। समन्वयक डॉ. शिल्पी भट्टाचार्य ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
कुलपति डॉ. आर. श्रीधर ने कहा कि सतत विकास केवल सरकार नहीं, बल्कि हर नागरिक की साझा जिम्मेदारी है। सामूहिक प्रयासों से ही न्यायपूर्ण, समृद्ध और प्रकृति-अनुकूल भविष्य का निर्माण संभव है।



