नई दिल्ली। एक समय था जब भारत में टेलीविजन का मतलब लगभग सिर्फ दूरदर्शन हुआ करता था। निजी चैनलों का दौर शुरू भी नहीं हुआ था। इसी दौर में हरियाणा की एक मंडी से निकले एक कारोबारी ने ऐसा जोखिम लिया, जिसने भारतीय टेलीविजन की तस्वीर बदल दी।
नाम था सुभाष चंद्रा गोयनका।
आज वही सुभाष चंद्रा एक बार फिर चर्चा में हैं। वजह इस बार कोई नया चैनल या कारोबारी विस्तार नहीं, बल्कि उनका व्यक्तिगत insolvency case है। राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण यानी NCLT ने करीब ₹22,006.57 करोड़ के admitted claims के मुकाबले लगभग ₹6.5 करोड़ के repayment plan को मंजूरी दी है। यह करीब 99.97 फीसदी का अंतर है। हालांकि यह समझना जरूरी है कि यह रकम Essel Group की कुल देनदारी का सीधा माफ होना नहीं है। मामला उन देनदारियों से जुड़ा है जिनके लिए सुभाष चंद्रा ने व्यक्तिगत गारंटी दी थी।
इस फैसले ने देश के कारोबारी और बैंकिंग क्षेत्र में बहस छेड़ दी है। कुछ वित्तीय संस्थानों ने फैसले को चुनौती देने की तैयारी भी शुरू कर दी है।
लेकिन इस कहानी को सिर्फ कर्ज और NCLT के आंकड़े से समझना मुश्किल है। इसके पीछे करीब छह दशक की वह कारोबारी यात्रा है, जिसमें एक छोटे शहर का लड़का अनाज के कारोबार से निकलकर भारत के सबसे बड़े मीडिया उद्यमियों में शामिल हुआ।
17 रुपये से शुरू होने वाली कहानी?
सुभाष चंद्रा की शुरुआती जिंदगी किसी बड़े कारोबारी परिवार के वारिस की कहानी नहीं थी। उनका परिवार हरियाणा के आदमपुर मंडी में अनाज के कारोबार से जुड़ा था। परिवार के कारोबार पर कर्ज का दबाव था और किशोर उम्र में ही सुभाष चंद्रा को पढ़ाई छोड़कर कारोबार में उतरना पड़ा।
कई जगह उनकी शुरुआती कारोबारी यात्रा को बेहद छोटी पूंजी और संघर्ष से शुरू होने वाली कहानी के तौर पर बताया गया है। उनकी आत्मकथा ‘The Z Factor’ में भी शुरुआती संघर्ष, परिवार के कारोबार और आगे बढ़ने की कोशिशों का जिक्र मिलता है।
व्यापार में उतरने के बाद उनका ध्यान सिर्फ पारंपरिक तरीके से कारोबार करने पर नहीं रहा। वह लगातार यह तलाशते रहे कि मौजूदा कारोबार को अलग तरीके से कैसे बढ़ाया जा सकता है।
अनाज से शुरू हुआ पहला बड़ा मोड़
सुभाष चंद्रा ने अनाज और चावल के कारोबार से शुरुआत की। इसी दौरान Food Corporation of India यानी FCI से जुड़े कारोबार और सरकारी खरीद व्यवस्था को समझने का मौका मिला।
एक समय FCI के अधिकारी से हुई बातचीत ने उनके कारोबार की दिशा बदलने में भूमिका निभाई। उन्होंने सरकारी खरीद और सेना की जरूरतों के बीच एक कारोबारी अवसर देखा और अनाज की सप्लाई के क्षेत्र में आगे बढ़े। बाद में उन्होंने सोवियत संघ को अनाज निर्यात का कारोबार भी किया।
यही वह दौर था जब एक छोटे कारोबारी को बड़े कारोबार की दुनिया समझ में आने लगी थी।
लेकिन सुभाष चंद्रा की खासियत सिर्फ एक सफल कारोबार चलाना नहीं थी। उनकी नजर हमेशा अगले अवसर पर रहती थी।
1980 के दशक में पैकेजिंग कारोबार
अनाज कारोबार से पैसा और अनुभव मिलने के बाद उन्होंने एक बिल्कुल अलग क्षेत्र में कदम रखा।
उन्होंने पैकेजिंग कारोबार शुरू किया। Essel Propack इसी विस्तार का हिस्सा था। कंपनी ने laminated packaging tubes के कारोबार में अपनी पहचान बनाई।
उस समय परिवार और आसपास के लोगों के लिए यह फैसला आसान नहीं था। एक सफल अनाज कारोबारी अचानक पैकेजिंग जैसे नए क्षेत्र में क्यों जा रहा है, यह सवाल उठना स्वाभाविक था।
लेकिन यही जोखिम लेने की आदत आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी।
फिर बनाया EsselWorld
1989 में सुभाष चंद्रा के कारोबार ने मनोरंजन के क्षेत्र में भी कदम रखा और EsselWorld सामने आया।
यह सिर्फ एक नया व्यवसाय नहीं था। यह उस समय भारत में मनोरंजन उद्योग के बदलते स्वरूप का संकेत था।
चंद्रा का कारोबार अब सिर्फ अनाज और पैकेजिंग तक सीमित नहीं था। वह मीडिया, मनोरंजन, केबल, टेलीविजन और बाद में DTH जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में उतरते गए।
1992 में लिया सबसे बड़ा जोखिम
फिर आया साल 1992।
उस समय भारत में टेलीविजन का बाजार तेजी से बदल रहा था। आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय दर्शकों की पसंद बदल रही थी और केबल नेटवर्क का विस्तार शुरू हो रहा था।
सुभाष चंद्रा ने इसी बदलाव को पहचाना।
उन्होंने Zee TV लॉन्च किया।
Zee Entertainment के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार Zee TV भारत का पहला निजी satellite television channel था, जिसने निजी टेलीविजन के नए दौर को जन्म दिया। कंपनी आज भी सुभाष चंद्रा को भारतीय निजी टेलीविजन का अग्रणी और “Father of Indian Television” कहती है।
यह फैसला आसान नहीं था। टेलीविजन चैनल शुरू करने के लिए बड़े निवेश की जरूरत थी। लेकिन चंद्रा ने जोखिम लिया।
और यही जोखिम उनकी सबसे बड़ी सफलता बन गया।
दूरदर्शन के दौर से निजी टीवी तक
Zee TV की सफलता ने भारतीय दर्शकों के लिए मनोरंजन का विकल्प बदल दिया।
अब घरों में सिर्फ दूरदर्शन नहीं था। निजी चैनल आने लगे। नए कार्यक्रम बनने लगे। विज्ञापन बाजार तेजी से बढ़ा और भारतीय टेलीविजन उद्योग का आकार बदलने लगा।
बाद में Zee नेटवर्क ने मनोरंजन के साथ समाचार, क्षेत्रीय भाषाओं और अन्य content segments में भी विस्तार किया।
सुभाष चंद्रा ने 1999 में Zee News की शुरुआत की। इसके बाद मीडिया कारोबार का दायरा और बड़ा होता गया।
Zee के अलावा Essel Group का कारोबार packaging, cable distribution, entertainment और DTH तक फैल गया।
Dish TV ने बदली देखने की आदत
टेलीविजन में चंद्रा का अगला बड़ा दांव DTH था।
Dish TV के जरिए satellite television को सीधे घरों तक पहुंचाने की कोशिश हुई। इससे भारतीय दर्शकों के लिए television distribution का तरीका बदलने लगा।
इस दौर में सुभाष चंद्रा सिर्फ चैनल के मालिक नहीं रह गए थे। वह television ecosystem के अलग-अलग हिस्सों में कारोबार कर रहे थे।
यही वजह है कि उन्हें भारत के सबसे प्रभावशाली media entrepreneurs में गिना जाने लगा।
कारोबार के साथ राजनीति में भी कदम
सुभाष चंद्रा की पहचान सिर्फ कारोबारी तक सीमित नहीं रही।
2016 में वह हरियाणा से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा पहुंचे। उन्हें BJP के विधायकों का समर्थन मिला था। उनका कार्यकाल 2016 से 2022 तक रहा।
इस दौरान उनका नाम कारोबारी दुनिया के साथ राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन में भी प्रमुखता से सामने आया।
फिर शुरू हुआ मुश्किल दौर
हर बड़ी कारोबारी कहानी में एक ऐसा दौर आता है जब विस्तार ही सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है।
Essel Group ने कई क्षेत्रों में तेजी से विस्तार किया था। लेकिन infrastructure और अन्य कारोबारों में बढ़ती वित्तीय जरूरतों ने समूह पर दबाव बढ़ाया।
2019 के आसपास Essel Group गंभीर debt crisis में फंस गया।
समूह को कर्ज चुकाने के लिए कई संपत्तियों और हिस्सेदारियों को बेचने की जरूरत पड़ी। Zee Entertainment में परिवार की हिस्सेदारी भी कम हुई।
जिस कारोबारी साम्राज्य ने कभी लगातार विस्तार देखा था, अब उसका फोकस कर्ज घटाने और वित्तीय दबाव से निकलने पर था।
Zee से दूरी बढ़ी
सुभाष चंद्रा ने Zee Entertainment की स्थापना की थी। लेकिन वित्तीय संकट के बाद कंपनी में उनका नियंत्रण और हिस्सेदारी पहले जैसी नहीं रही।
आज Zee Entertainment की वेबसाइट पर उन्हें Chairman Emeritus के रूप में दर्ज किया गया है। कंपनी के मुताबिक वह Zee Entertainment और Essel Group के संस्थापक हैं।
यानी जिस Zee को उन्होंने शून्य से खड़ा किया था, उसके रोजमर्रा के संचालन से वह अब पहले की तरह जुड़े नहीं हैं।
और अब ₹22,006 करोड़ वाला मामला
अब आते हैं उस खबर पर जिसने सुभाष चंद्रा को फिर से राष्ट्रीय चर्चा में ला दिया है।
NCLT के सामने उनकी personal insolvency proceeding में creditors के admitted claims करीब ₹22,006.57 करोड़ बताए गए।
लेकिन मंजूर repayment plan के तहत creditors को करीब ₹6.25 करोड़, जबकि लगभग ₹25 लाख insolvency process के लिए रखे गए हैं। कुल रकम करीब ₹6.5 करोड़ बैठती है।
यही वजह है कि इसे करीब 99.97 फीसदी haircut कहा जा रहा है।
लेकिन यहां एक जरूरी बात समझना बेहद जरूरी है।
क्या ₹22 हजार करोड़ का पूरा कर्ज माफ हो गया?
नहीं, इसे इस तरह समझना सही नहीं होगा।
यह मामला सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत insolvency proceeding और उन loans की personal guarantees से जुड़ा है जो Essel Group की अलग-अलग कंपनियों ने लिए थे।
यानी ₹22,006 करोड़ का आंकड़ा सीधे यह नहीं बताता कि सुभाष चंद्रा ने खुद ₹22 हजार करोड़ बैंक से लेकर खर्च कर दिए थे।
NCLT के मामले में सवाल यह है कि उनकी personal guarantees के आधार पर creditors उनसे कितनी राशि वसूल सकते हैं और insolvency framework के तहत resolution कैसे होगा।
बैंक क्यों कर रहे हैं विरोध?
इस फैसले का सबसे बड़ा सवाल recovery को लेकर है।
यदि admitted claims हजारों करोड़ रुपये हैं और repayment कुछ करोड़ रुपये में तय होता है, तो स्वाभाविक रूप से creditors के बीच असंतोष पैदा हुआ है।
HDFC Bank और LIC Housing Finance सहित कुछ वित्तीय संस्थान इस फैसले को चुनौती देने के विकल्प पर विचार कर रहे हैं।
यही कारण है कि यह मामला केवल सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत वित्तीय स्थिति का विषय नहीं रह गया है। यह भारत की insolvency व्यवस्था और lenders की recovery प्रक्रिया पर भी बहस खड़ी कर रहा है।
एक कारोबारी की कहानी में दो बिल्कुल अलग तस्वीरें
सुभाष चंद्रा की कहानी को दो हिस्सों में देखा जा सकता है।
पहला हिस्सा है निर्माण का।
एक छोटे शहर का युवक, परिवार का कर्ज, अनाज का कारोबार और फिर packaging, amusement park, television, news, cable और DTH तक लगातार नए कारोबार में प्रवेश।
दूसरा हिस्सा है वित्तीय दबाव का।
तेजी से विस्तार, बड़े निवेश, कर्ज का दबाव, assets की बिक्री, Zee में हिस्सेदारी घटना और अंततः personal insolvency proceedings।
यही विरोधाभास सुभाष चंद्रा की कहानी को बाकी कारोबारी biographies से अलग बनाता है।
सफलता का सबसे बड़ा सबक क्या है?
सुभाष चंद्रा की यात्रा से सबसे बड़ा सबक सिर्फ यह नहीं है कि जोखिम लेने से सफलता मिलती है।
उनकी कहानी यह भी दिखाती है कि तेजी से विस्तार करने वाले कारोबार में वित्तीय अनुशासन उतना ही जरूरी है जितना vision।
उन्होंने जिस समय भारतीय टेलीविजन का भविष्य देखा, उस समय बहुत कम लोगों ने निजी satellite television की संभावनाओं को उसी तरह देखा था।
लेकिन बाद के वर्षों में तेजी से बढ़ते कारोबार और कर्ज का दबाव उनकी सबसे बड़ी चुनौती बन गया।
यानी एक ही व्यक्ति की कहानी में entrepreneurship की ताकत भी है और over-expansion के जोखिम की सीख भी।
आज सुभाष चंद्रा कहां खड़े हैं?
आज सुभाष चंद्रा को Zee Entertainment की आधिकारिक वेबसाइट पर Chairman Emeritus के रूप में दर्ज किया गया है। वह Essel Group के संस्थापक भी हैं। उन्होंने Subhash Chandra Foundation की स्थापना भी की, जो शिक्षा, empowerment, entrepreneurship और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में काम करती है।
उनकी पहचान आज भी भारतीय television industry के सबसे बड़े शुरुआती बदलावों से जुड़ी हुई है।
लेकिन मौजूदा NCLT मामला उनकी कहानी में एक नया अध्याय जोड़ता है।
एक तरफ वह व्यक्ति है जिसने भारत में निजी satellite television की नींव रखने वाले कारोबार को खड़ा किया, और दूसरी तरफ वही कारोबारी आज दुनिया की सबसे चर्चित personal insolvency proceedings में से एक का सामना कर रहा है।
शायद सुभाष चंद्रा की कहानी का सबसे बड़ा सबक यही है कि कारोबार में सबसे कठिन काम सिर्फ साम्राज्य खड़ा करना नहीं, बल्कि उसे लंबे समय तक वित्तीय रूप से टिकाए रखना भी है।
सुभाष चंद्रा की कहानी एक नजर में
1950: हरियाणा के आदमपुर में जन्म
किशोरावस्था: परिवार के अनाज कारोबार में उतरे
1970 के दशक: अनाज कारोबार और निर्यात में विस्तार
1980 का दशक: पैकेजिंग कारोबार में प्रवेश
1989: EsselWorld
1992: Zee TV लॉन्च
1999: Zee News की शुरुआत
2003: Dish TV के जरिए DTH कारोबार में विस्तार
2016: हरियाणा से राज्यसभा पहुंचे
2019 के बाद: Essel Group पर वित्तीय दबाव और कर्ज संकट
2026: NCLT ने personal insolvency case में करीब ₹22,006.57 करोड़ के admitted claims के मुकाबले लगभग ₹6.5 करोड़ के repayment plan को मंजूरी दी।
